स्टेट बैंक ऑफ पाकिस्तान ने बैंकों को बिना किसी ठोस कानूनी वजह, सक्षम अथॉरिटी की मंजूरी और सही वेरिफिकेशन के किसी भी कस्टमर का बैंक अकाउंट ब्लॉक या फ्रीज करने से रोक दिया है।
सेंट्रल बैंक की तरफ से इस्लामाबाद हाई कोर्ट को सौंपी गई रिपोर्ट में कहा गया है कि सभी कमर्शियल और माइक्रोफाइनेंस बैंकों के चीफ कंप्लायंस ऑफिसर्स को यह पुख्ता करने का निर्देश दिया गया है कि किसी भी बैंक अकाउंट पर डेबिट ब्लॉक, ऑपरेशनल बैन या अकाउंट फ्रीज करने की कार्रवाई क़ानून, क़ानूनी अथॉरिटी और सही वेरिफिकेशन के बाद ही की जाए।
ध्यान दें कि 2 जून को इस्लामाबाद हाई कोर्ट ने एक नागरिक की याचिका पर सुनवाई करते हुए एक प्राइवेट बैंक पर जुर्माना लगाया था और स्टेट बैंक को इस बारे में नए नियम और क़ानून बनाने का निर्देश दिया था, जिसके पालन में सेंट्रल बैंक ने अब यह क़दम उठाया है।
स्टेट बैंक ने कमर्शियल बैंकों को और क्या निर्देश जारी किए हैं ? सेंट्रल बैंक ऑफ़ पाकिस्तान की तरफ़ से कमर्शियल बैंकों को जारी किए गए निर्देश में कहा गया है कि अब कोई भी बैंक सिर्फ़ अंदाज़े या किसी शक़ के आधार पर नागरिकों के अकाउंट के ख़िलाफ़ एकतरफ़ा कार्रवाई नहीं कर पाएगा।
क़ानूनी अधिकार की ज़रूरत
देश भर के सभी कमर्शियल और माइक्रोफ़ाइनेंस बैंकों के चीफ़ कंप्लायंस ऑफ़िसर्स को यह ज़रूरी कर दिया गया है कि किसी भी कस्टमर के अकाउंट को फ़्रीज़ करने या उस पर ऑपरेशनल रोक लगाने से पहले उनके पास सही क़ानूनी अधिकार और सक्षम अधिकारी की मंज़ूरी हो।
सही वेरिफ़िकेशन प्रोसेस
नोटिफ़िकेशन के मुताबिक, अब बैंकों के लिए किसी भी अकाउंट पर डेबिट ब्लॉक लगाने से पहले मामले का पूरा और सही वेरिफ़िकेशन करना ज़रूरी होगा।
बैंकों का अंदरूनी सिस्टम
स्टेट बैंक ने सभी बैंकों को यह भी निर्देश दिए हैं कि वे इस कोर्ट के आदेश को लागू करने के लिए अपना सही अंदरूनी कंप्लायंस सिस्टम बनाएं।
सेंट्रल बैंक ने साफ़ किया है कि इस नए तरीके का मक़सद यह पुख्ता करना है कि बैंकों द्वारा अनजाने में या सिर्फ़ एहतियाती क़दम उठाए जाने की वजह से अकाउंट होल्डर्स को कोई गैर-ज़रूरी फ़ाइनेंशियल या पर्सनल नुकसान न हो। इस फैसले के बाद, अब देश भर के बैंक कस्टमर्स को यह बड़ी सुविधा मिलेगी कि बैंक मैनेजमेंट सिर्फ़ शक या एहतियाती उपाय के आधार पर उनके अकाउंट बंद नहीं कर पाएगा या पैसे निकालने पर रोक नहीं लगा पाएगा। जबकि पहले, बैंकों की ऐसी हरकतों की वजह से नागरिकों को मुश्किलों का सामना करना पड़ता था।
इस्लामाबाद हाई कोर्ट का फैसला और प्राइवेट बैंक पर जुर्माना
स्टेट बैंक के इस फैसले का बैक ग्राउंड इस्लामाबाद हाई कोर्ट के जज जस्टिस अरबाब मुहम्मद ताहिर का छह पेज का फैसला है, जिसमें एक प्राइवेट बैंक पर बिना किसी क़ानूनी वजह के नागरिक मुहम्मद उस्मान का अकाउंट ब्लॉक करने पर 300,000 रुपये का जुर्माना लगाया गया था।
मामले के फैक्ट्स के मुताबिकए छब्ब्प्। ने बैंक से सिर्फ़ एक जांच के सिलसिले में उस नागरिक का डेटा मांगा था। हालांकि, बैंक ने डेटा देने के साथ-साथ एहतियाती उपाय के तौर पर कस्टमर का अकाउंट भी खुद ब्लॉक कर दिया।
सुनवाई के दौरान कोर्ट को बताया था कि उन्हें अकाउंट ब्लॉक करने के कोई निर्देश नहीं दिए गए थे, जिस पर प्राइवेट बैंक ने भी अपनी ग़लती मानी। अपने फ़ैसले में सुप्रीम कोर्ट ने बैंक के इस बर्ताव को पाकिस्तान के संविधान के आर्टिकल 23 और 24 का उल्लंघन बताया और साफ़ किया कि बैंक अकाउंट में जमा पैसा नागरिक की प्रॉपर्टी है और बिना किसी मज़बूत क़ानूनी वजह के किसी भी व्यक्ति को उसकी प्रॉपर्टी से दूर नहीं किया जा सकता।
कोर्ट ने बैंक को नागरिक को हुए नुक़सान की भरपाई के लिए हर महीने 300,000 रुपये का हर्जाना देने का आदेश दिया था, और स्टेट बैंक को नई गाइडलाइंस बनाने का भी निर्देश दिया था, जिसके बाद अब यह नया नोटिफ़िकेशन जारी किया गया है।
कानूनी और बैंकिंग जानकारों ने इस्लामाबाद हाई कोर्ट के इस फ़ैसले और स्टेट बैंक की नई गाइडलाइंस को कंज्यूमर्स के बुनियादी अधिकारों की रक्षा की दिशा में एक बड़ा कदम बताया है।
उनका कहना है कि कोर्ट ने बैंक अकाउंट में जमा पैसे को संविधान के आर्टिकल 23 और 24 के तहत नागरिक की प्रॉपर्टी या मालिकाना हक बताकर एक ज़रूरी कानूनी सिद्धांत साफ़ किया है। कानूनी जानकारों का मानना है कि पहले बैंक मैनेजमेंट अक्सर जांच एजेंसियों से बातचीत करके या एहतियात के तौर पर खुद ही अकाउंट सस्पेंड करने का फ़ैसला करते थे। हालांकि कोर्ट के इस फैसले के बाद अब नागरिकों के प्रॉपर्टी राइट्स सुरक्षित रहेंगे और बैंकों द्वारा एकतरफा कार्रवाई की संभावना कम हो जाएगी।
स्टेट बैंक का बड़ा फैसलाः बिना क़ानूनी वजह के किसी भी नागरिक का बैंक अकाउंट फ्रीज नहीं होगा
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