ज़मीने-कर्बला ने ज़ुल्म का लश्कर भी देखा है
कलेजा फट के रह जाए वही मंज़र भी देखा है
हुसैन इब्ने.अ़ली सा सब्र का पैकर भी देखा है
बदन तीरों से छलनी हर गुले-अतहर भी देखा है
अ़ली अब्बास का बदला हुआ तेवर भी देखा है
अ़ली अकबर की उस तलवार का जौहर भी देखा है
हां, देखा इसने क़ासिम सा हसीं दिलबर भी देखा है
गले पे तीर खाते वो अ़ली असग़र भी देखा है
गले पे शाह के वो ज़ुल्म का ख़ंजर भी देखा है
तिलावत करते नेज़े पे हुसैनी सर भी देखा है
यज़ीदी फ़ौज को यूं कांपते थर-थर भी देखा है
कि बिन्ते-फ़ातिमा में लहजा-ए-हैदर भी देखा है
ग़मे-कर्बु-बला में दिल ’’वली’’ मुज़्तर भी देखा है
कि जितना ग़म है बाहर उतना ग़म अन्दर भी देखा है
वली मोहम्मद ग़ौरी रज़वी ’वली’



