ऐ तिरंगे – अज़मत – ए – हिन्दोस्तां
तुझ पे क़ुर्बान दिल क़ुर्बान जां
तीन रंगों को मिलाकर तू बना
तेरे ही दम से हुई यह एकता
उड़ रहा है तू फ़ज़ाओं में सदा
ले के बढ़ता है तुझे हर क़ाफ़िला
सब सलामी दे रहे हैं नौजवां
ऐ तिरंगे -अज़मत-ए-हिन्दोस्तां
तेरी इज़्ज़त शान-ओ-शौकत क्या कहें
मिल गई है तुझ सी दौलत क्या कहें
कितनी है तुझ से मोहब्बत क्या कहें
तुझ पे है मिटने की चाहत क्या कहें
क्या गिराएंगी तुझे ये आंधियां
ऐ तिरंगे -अज़मत – ए – हिन्दोस्तां
दुश्मनों का हाथ न लगने दिया
आग में भी न तुझे जलने दिया
जीते जी तुझको नहीं झुकने दिया
खा के गोली न तुझे गिरने दिया
नाज़ करता हैं ये तुझ पे आसमां
ऐ तिरंगे – अज़मत -ए – हिन्दोस्तां
तेरे साए में चली वो टोलियां
बोलती वोह इंक़लाबी बोलियां
ख़ून से खेली जिन्होंने होलियां
खाईं हंस-हंस के बदन पर गोलियां
कैसे हम भूलें ’’वली’’ वोह दास्तां
ऐ तिरंगे-अज़मत-ए-हिन्दोस्तां
वली मोहम्मद ग़ौरी रज़वी ’’वली’’




