हज़रत मौलाना अहमद रज़ा खान बरेलवी का जन्म 10 शव्वाल 1272 / 14 जून 1856 को भारत के एक मशहूर शहर बरेली में हुआ।
उनका जन्म का नाम “मुहम्मद” रखा गया था, तारीखी (ऐतिहासिक) नाम मुख्तार (1272 हिजरी) सुझाया गया था, जबकि आपके दादा मौलाना रज़ा अली खां बरेलवी ने ‘अहमद रज़ा” नाम सुझाया था, जिससे वे मशहूर हुए।
हज़रत मौलाना अहमद रज़ा खान बरेलवी के पूर्वज कंधारी पठान थे। वे मुगल काल में लाहौर आए और वहीं बस गए और कुछ समय के बाद दिल्ली आ गए और दोनों जगहों पर बड़े ओहदों पर रहे। शुजाअत जंग जनाब मुहम्मद सईदुल्लाह खां इस परिवार के सबसे बड़े ओहदेदार थे। उनके साहबज़ादे सआदत यार खान को मुगल शासन के दौरान रोहिलखंड में एक अभियान पर भेजा गया था और जीत के बाद वह बरेली के सूबेदार हुए। उनके तीन बेटे थे। आज़म खान मोअज्जम खान और मुकर्रम खान और सभी मनसबदार थे। सबसे बड़े बेटे मुहम्मद आज़म खान बरेली के रिजवी परिवार के वारिस हैं।
उनके बेटे मौलाना रज़ा अली खान बरेलवी, मौलाना अहमद रज़ा बरेलवी के दादा और मौलाना नक़ी अली खान क़ादरी बरेलवी आपके वालिद हैं।
मौलाना अहमद रज़ा खान बरेलवी ने अपनी शुरुआती और पूरी किताबी शिक्षा अपने वालिद माजिद मौलाना नक़ी अली खान बरेलवी (विसाल 1297 हिजरी / 1880 ईस्वी) से हासिल की। आपने 1869 में कम उम्र में ही अपनी सारी पढ़ाई पूरी कर ली। उन्होंने मीज़ान, मनशअब वग़ैरह जनाब मिर्ज़ा ग़ुलाम क़ादिर बेग बरेलवी से पढ़ीं। आपके असातिज़ा (टीचर्स )की लिस्ट बहुत छोटी है, जिनमें से चंद के नाम ये हैं-:
मिर्ज़ा ग़ुलाम क़ादिर बेग बरेलवी, मौलाना अब्दुल अली रियाज़ीदां रामपुरी, सैयद शाह अबुल हुसैन अहमद नूरी मारहरवी, मौलाना नक़ी अली बरेलवी , सैयद आले रसूल क़ादरी मारहरवी।
1877 में, मारहरा ज़िला ऐटा उत्तरप्रदेश में अपने वालिद और मौलाना अब्दुल क़ादिर बरकाती के साथ शाह आले रसूल मारहरवी की खिदमत में हाज़िर हुए और उन से सिलसिला ए कादरिया बरकातिया में बैअत हुए । मुर्शिदे तरीक़त ने पहली ही मुलाक़ात में इजाज़त और ख़िलाफ़त अता कर दी। ये वो बुज़ुर्ग हैं जिन्होंने हज़रत शाह अब्दुल अज़ीज़ मुहद्दिस देहलवी से बराहे रास्त इल्म हासिल किया था। मौलाना अहमद रज़ा ख़ान बरेलवी ने 1877 में पहली बार और 1905 में दूसरी बार हज और जियारत का सफ़र किया।
इन दोनों सफरों के दौरान उन्होंने हरमैन शरीफ़ैन के बड़े जैयद उलैमा से मुलाक़ातें कीं और उनसे फ़ायदा उठाया। उन्होंने वहाँ के उलैमा के साथ इल्मी मुज़ाकरात ( ज्ञान-चर्चा) में हिस्सा लिया और अपनी कलामी फिक़ही, व इल्मी बसीरत से उलैमा ए हिजाज़ को मुत’अस्सिर किया।
मौलाना अहमद रज़ा ख़ान बरेलवी एक कामयाब मुअल्लिम थे। अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद, उन्होंने पढ़ाने का पेशा अपनाया, लेकिन किसी खास दर्सगाह से जुड़े नहीं रहे। स्टूडेंट्स उनके पास सीखने आते थे, और वह उन्हें अपने घर पर ही पढ़ाते थे। इस तरह, हज़ारों की तादाद में तालिबाने इल्म ने मौलाना अहमद रज़ा खान बरेलवी के इल्मो फ़ज़ल से इस्तीफादा किया और अपने-अपने इलाकों में जाकर इल्म के चिराग़ रोशन किए।
आपके मशहूर तलमिज़ा ओ खुल्फा में जिन खास लोगों का ज़िक्र है, वे हैं: मुफ़्ती अमजद अली आज़मी रिज़वी मुसन्निफ़ बहारे शरीयत , मौलाना मुहम्मद नईमुद्दीन मुरादाबादी, मौलाना सैयद सुलेमान अशरफ़ अलीगढ़ी, मौलाना अब्दुल अलीम सिद्दीकी मेरठी, मौलाना बुरहानुल हक़ जबलपुरी, मौलाना ज़फ़रुद्दीन बिहारी मुसन्निफ़ हयात आला हज़रत, मौलाना हसन रज़ा खान बरेलवी, मौलाना हामिद रज़ा खान बरेलवी, मौलाना मुस्तफ़ा रज़ा नूरी बरेलवी, मौलाना सैयद मुहम्मद अशरफ़ी मुहद्दिस कछो छवी और काज़ी अब्दुल वहीद फिरदौसी अज़ीमाबादी।
उन्होंने (असली और नक़ली उलूमो फनून) थ्योरेटिकल और रैशनल साइंस और आर्ट्स, दोनों पर फतवे के रूप में कई किताबें लिखी हैं। उन्होंने इल्मे तफसीर, हदीस, फिक़ह , उसूले फिक़ह ज्यूरिस्प्रूडेंस, ज्यूरिस्प्रूडेंस के प्रिंसिपल्स, हदीस के प्रिंसिपल्स, सूफीवाद, लॉजिक और फिलॉसफी, प्रोज़ और पोएट्री, हिस्ट्री और ट्रैवल, और दूसरे साइंस और आर्ट्स के फील्ड में एक हमेशा रहने वाली विरासत छोड़ी है। वह अलग-अलग साइंस और आर्ट्स में माहिर थे।
मौलाना अहमद रजा खान हायर और लोअर दोनों साइंस में बराबर माहिर थे। उन्हें ज्यूरिस्प्रूडेंस और फतवों का खास शौक था। मौलाना अहमद रजा खान बरेलवी ने मुसलमानों में धार्मिक शिक्षा को आम करने के लिए 1904 में मदरसा मंज़र-उल-इस्लाम बरेली को क़ायम किया, जिसके एकेडमिक फायदे आज भी जारी हैं। मौलाना अहमद रजा खान बरेलवी एक कामयाब टीचर और राइटर होने के साथ-साथ एक बेहतरीन मुबल्लिग़ भी थे और उन्होंने धर्म की सेवा और प्रचार में अपनी सबसे अच्छी काबिलियत का इस्तेमाल किया। उन्होंने अपने समय की परंपरा के मुताबिक डिबेट और बहस में भी हिस्सा लिया। मौलाना अहमद रजा खान मुसलमानों के दीन और ईमान को लेकर बहुत फिक्रमंद थे। इस तरह, जब शुद्धि आंदोलन को ताकत मिली, तो उन्होंने उसका मुकाबला करने के लिए जमात-ए-रज़ा-ए-मुस्तफ़ा की स्थापना की, जिसने उस समय मुसलमानों को गुमराही और गलती में पड़ने से बचाने के लिए बहुत कोशिशें कीं।
हज़रत मौलाना अहमद रज़ा खान बरेलवी की शखसीयत और कैरेक्टर जिस खास खूबी की वजह से जाना और पॉपुलर है, वह है पैगंबर स अ व से उनका प्यार और आज्ञाकारिता उनकी पूरी ज़िंदगी मुहम्मद स अ व की शरीयत और पैगंबर की सुन्नत को मानने में गुज़री, जिसमें इश्के मुस्तफा का ग़ल्बा रहा है। हिदायक़े बख्शिश उनके नातिया कलाम का कलेक्शन है और आपके इश्क़े रिसालत का नमूना है। आपके दीनी व इल्मी व फिक़ही कारनामे और तजदीदी ख़िदमात की वजह से, यूनाइटेड इंडिया के जाने-माने सुन्नी विद्वानों ने उन्हें चौदहवीं सदी का मुजद्दिद माना है और उन्हें सुन्नियों (बरेलवी) के इमाम के टाइटल से याद किया जाता है, जबकि अहले मुहब्बत और अक़ीदत के हल्के में “आला हज़रत” से आपको शोहरत हासिल है।
हज़रत मौलाना अहमद रज़ा खान बरेलवी कई किताबों के लेखकों वाली शख्सियत हैं। उनकी मशहूर तसानीफ इस तरह हैं।
1- कंज़-उल-ईमान फी तर्जमतुल-कुरान, कुरान मजीद का एक तर्जुमा।
इस तर्जुमा के अलावा, मौलाना अहमद रज़ा खान ने कई तफ़सीरी हासिए (कमेंट्री) भी लिखी हैं।
2 – फतावा रज़ाविया मौलाना अहमद रज़ा खान के फतवों का 21 वॉल्यूम में कलेक्शन है। इसके अलावा, उन्होंने फतवों के अलग-अलग कलेक्शन पर कमेंट्री भी लिखी हैं।
3- अल-मलफ़ुज़ मौलाना अहमद रज़ा खान का मलफ़ुज़ात का एक कलेक्शन है (चार हिस्सों में पब्लिश हुआ)। किताबों और रिसालों (मैगज़ीन) के अलावा, मौलाना अहमद रज़ा खान बरेलवी ने अपने पीछे बड़ी संख्या में अपने वारिसों और उत्तराधिकारियों को भी छोड़ा हैं, जिन्होंने उनके बाद भी उनके मिशन को जारी रखा। उनमें से कुछ का ज़िक्र ऊपर किया गया है। मौलाना अहमद रज़ा खान ने 28 अक्टूबर 1921 को बरेली में वफात पाई है और उन्हें मोहल्ला सौदागर में दफ़नाया गया। वहीं दरगाह आला हज़रत है।



