वमा अरसलनाक इल्ला रहमतल्लिल आलमीन
( ऐ नबी ! हमने आपको तमाम जहानों के लिए सिर्फ रहमत बना कर भेजा है)
फलक़ से पूछे कोई नूरे अहमदी क्या है
चराग़े बज़्मे दो आलम की रोशनी क्या है
बुला के अर्श पर खालिक़ ने सरफराज़ किया
फरिश्तो! देख लो शाने मुहम्मदी क्या है।
इस महीने की अहमीयत- माह रबिउल अव्वल क़मरी इस्लामिक साल का तीसरा महीना है। यह बड़ा मुतबर्रक़ और फज़ीलत वाला महीना है। जब शुरु में इस महीने का नाम रबिउल अव्वल रखा गया तो उस वक़्त मौसमे रबी था और तब ही से इसका नाम रबिउल अव्वल समझा जाने लगा। यह महीना खैरात और बरकात का महीना है। इस महीने की अहमियत इसलिए बढ़ जाती है कि इस महीने के दौरान आखरी नबी सलल्लाहु अलैहि व सल्लम की पैदाइश हुई है और इसी महीने की 8 तारीख को रसूलुल्लाह सल ने मक्कातुल मुकर्रमा से मदीना मुनव्वरा को हिज़रत फरमाई। इसी महीने की 10 तारीख को रसूलुल्लाह सल का अक़द (निकाह) हज़रत बीबी ख़दीजातुल क़ुबरा रज़ियल्लाहु अन्हा से हुआ। इसी महीने में रसूलुल्लाह सल का विसाल हुआ। इसी महीने में आप सल की ज़ौजा हज़रते ज़ैनब का इंतक़ाल हुआ और अपनी जोजा हज़रत जवेरिया बिन्ते हारिस रज़ि का भी विसाल हुआ। इस तरह यह महीना ग़म और खुशी दोनांे का ही है। इस महीने का ईद मीलादुन्नबी का रोज़ इस्लामिक तारीख का सबसे मुबारक दिन है।
आमदे रसूल– इस दिन कायनात की सबसे बड़ी हस्ती और अज़ीम शख्सीयत आफताबे रिसालत, माहताबे नुबूवत, सैयदे आलम, नूरे मुज़स्सम, सरवरे कायनात, मुख्तारे दो आलम, हज़रत अहमदे मुजतबा, मुहम्मद मुस्तफा सलल्लाहु अलैहि व सल्लम की दुनिया में तशरीफ आवरी हुई।
नूर की आमद- हज़रत मुहम्मद सल की विलादत की वजह से दुनिया में छाया हुआ जिहालत का अंधेरा ख़त्म हुआ और ईमान का नूर फैला और फैलता ही चला गया।
विलादत बा सआदत और इसका पसमंज़र
तारीख-ओ मक़ाम हज़रत मुहम्मद सल की पैदाइश 12 रबिउल अव्वल आमुल फील बमुताबिक़ 20 अप्रेल 571 बमुताबिक़ 01 जेष्ठ 628 विक्रमी बरोज़ पीर (सोमवार) सुबह के वक़्त मक्का शहर के मुहल्ले शौक़ुल लैल में बीबी हज़रत आमिना और हज़रत अब्दुल्लाह के घर में हुई। जब पोते की यह खबर आप सल के दादा अब्दुल मत्तलिब ने सुनी तो दादा खुशी-खुशी तशरीफ लाए और आप सल को बैतुल्लाह में ले जा कर अल्लाह से दुआ की और अल्लाह का शुक्र अदा किया।
उस वक़्त मक्का में अकाल पड़ा हुआ था। आपकी पैदाईश के बाद खूब पानी बरसा और अकाल से छुटकारा मिल गया।
एक अरब ने आदमी का बोल बाला कर दिया
दुनिया में इस्मे मुहम्मद से उजाला कर दिया।
अरब के हालात आप सल दुनिया में तशरीफ लाने से पहले अरब के हालात बेहद बिगड़े हुए थे अरब मआशरा बुराइयों और जंगों, और जिहालत के अंधेरों में डूबा हुआ था। आप सल की पैदाइश से पहले अरब के हालात मज़हबी अखलाक़ी और मआशरती लिहाज़ से इंतिहाई तारीकी (अंधेरा) और ज़वाल (गिरावट) का शिकार था।
मज़हबी हालात-बुत परस्ती-अरब की अकसीरियत शिर्क और बुत परस्ती में मुब्तिला थी, यहां तक कि काबा के अंदर और इर्द-गिर्द 360 बुत नसब किए हुए थे। जिन में खास बुत लात, मनात और हुब्ल खास और बड़े देवी देवता माने जाते थे, इसके अलावा कई क़बीले चांद, सूरज, सितारों, दरख्तों और पत्थरों की भी पूजा करते थे।
असल तालीमात से दूरी इस वक़्त तक हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम का जो दीने हनीफ था क़रीब-क़रीब खतम हो चुका था, अलबत्ता इक्के-दुक्के अफराद ही तोहीद पर क़ायम थे।
मआशरती हालात माअशरा अलग-अलग क़बीलों में बंटे हुए थे हर क़बीला अपने आप को सबसे बहतर समझता था।
खूंरेज़ी जंगें आपस में मामूली-मामूली बात पर क़बीलों के दरमियान होने वाली जंगें घोड़ों की दौड़ या ऊंटों को पानी पिलाने के मामलों में हुई जंगें बरसों बरस जारी रहती थी।
दुख्तर कुशी कई लोग बेटियों की पैदाइश ज़िल्लत और बद सगूनी समझते थे और शर्म के मारे बच्चियों को ज़िन्दा दफन कर देते थे। ग़ैरत और भूखमरी के खौफ ऐसा काम करते थे, ये रस्में आम हो चुकी थी।
औरतों का मक़ाम औरतों का माअशरे में कोई एहतराम नहीं था, उन के किसी प्रकार के अधिकार नहीं थे, माले तिजारत की तरह समझा जाता था, कनीज़ों और ग़ुलामों के साथ जानवरों से बद्दतर बरताव किया जाता था। इनके लिए कोई बुनियादी अधिकार नहीं थे, जिसकी वजह से कोई क़ानूनी डर पैदा हो सके।
अख्लाक़ी और सियासी हालात
बुराइयां माअशरे में शराब नोशी, जुआ खेलना, सूद खोरी, और बदकारी आम थी, ये बुराइयां रग-रग में बस चुकी थीं।
लाक़ानूनियत पूरे अरब में कोई मरकज़ी (केन्द्रीय) हुकूमत या क़ानून नाफिज़ करने वाला कोई वाहिद इदारा नहीं था। बस ताक़तवर क़बीलों या सरदारों का ही हुक्म ही क़ानून की हैसियत रखता था। पूरी तरह से जंगल राज था। पैदाइशे रसूल से पहले अरब की हालत इन्सानियत के ज़वाल (गिरावट) आखरी हदों को छू रही थी, जिसे बाद में नबी सल ने अपनी तालीमात के ज़रीए अमन, इंसाफ, और अखलाक़, आला तरीन नमूने में तब्दील कर दिया।
रहमते इलाही अरब के ऐसे हालात में उस कौम के सीनो से कुफ्र की पलिदियों को निकाल कर तौहीद की शमा रोशन करना कोई आसान काम नहीं था, उस वक़्त इस्लाम का इक़रार करना गोया कि आबाओ अजदाद(बाप दादाओं का तरीक़ा) का इनकार करना। खानदान और क़बीले वालों से टक्कर मोल लेने के बराबर था। खास तौर से ऐसे माअशरे में जहां का निज़ाम (तौर तरीक़ा) खानदान और बिरादरी का पाबंद हो और खानदान से जुदाई का मतलब समाजिक मौत।
इन सबके सामने आखिर वोह क्या जज़़्बा और क्या हक़ीक़त थी जिसके सामने यह सारी मुश्किलें रेत की दीवार और पानी के बुलबुले से ज़ियादा कोई हैसियत न रखती थी। इस मामले में आप सल को बहुत सी तकलीफें आई मगर आप ने कभी सब्र और हिम्मत नहीं दोड़ी, जबकि आप तन्हा थे आप सल के वालिद आप सल के पैदा होने से पहले ही गुज़र चुके थे और वालिदा का आपकी पैदाइश के कुछ टाईम बाद इंतक़ाल हो गया था। एक समय तो ऐसा भी आया कि आपका सबसे बड़ा सहारा हज़रत बीबी खदीजातुल क़ुबरा रज़ि और आप के दूसरे सहारा आपके चचा अबुतालिब भी आपका साथ छोड़ कर दुनिया से रुखसत हो चुके थे। कुछ असहाब (साथियों) के साथ अल्लाह का पैग़ाम ले कर अरब के हालात को बदलने निकल पड़े और अल्लाह ने इन्सानियत की हिदायत के लिए अपने आखरी नबी हज़रत मुहम्मद सल को रहमतल्लिल आलमीन (तमाम जहानों, पूरी कायनात के लिए रहमत) बना कर भेजा, रसूल की ज़ात सरापा हिदायत और सुकून है।
अल्लाह ने 100 रहमतें नाज़िल फरमाई है उन में से सिर्फ एक हिस्सा ज़मीन पर नाज़िल किया है। उस एक हिस्से की वजह से तमाम मख्लूक़ात , इन्सान और हैवान आपस में मुहब्बत और शफक़त करते हैं। बाक़ी 99 वें रहमतें अल्लाह ने अपने पास रखी हैं जिन से क़यामत के रोज़ अललाह की तरफ से बंदों पर रहम फरमाया जाएगा। हदीस- मिस्क़ात शरीफ की हदीस में रिवायत है कि अल्लाह की रहमत अपने ग़ज़ब पर भारी है और वोह अपने बंदों की तौबा पर बेहद खुश होता है। बतौर रहमतुल्लिल आलमीन– अल्लाह ने क़ुरआन में फरमाया- और हमने आपको तमाम जहानों के लिए रहमत बना कर भेजा है ।
अखलाक़ और तालीमात
उसवा-ए-हसना-आपके अखलाक़ साबिर, और माफ करने वाले थे, पूरी इन्सानियत के लिए एक बहतीन और कामिल नमूना थे, उम्मुल मोमिनीन हज़रत आयशा रज़ि ने आप सल के अखलाक़ के बारे में बताया। आपके अखलाक़ ’’ क़ुरआन मजीद का अमली नमूना थे।’’ आप सल ने ज़ाती तौर पर इंतक़ाम कभी नहीं लिया। फतेह मक्का के मौक़े पर अपने जानी दुश्मनों को भी माफ कर दिया। आप सल नुबूवत से पहले ही सादिक़, सच्चे, और अमीन (अमानतदार) के नाम से मशहूर थे। आप लोगों के साथ इंतिहाई शफक़त से पेश आते, आपने कभी किसी को सख्त लहजे में जवाब नहीं दिया।
मखलूक़े खुदा से मुहब्बत आप सल ग़रीबों, यतीमों, बेवाओ, मुहताजों का खास खयाल रखते थे। उन की मदद के लिए हमेशा आगे रहते थे।
अमल और इंसाफ- आप सल हर एक के साथ बराबर का इंसाफ करते थे, अमीर और ग़रीब का फर्क़ आपके नज़दीक़ कोई अहमियत नहीं रखता था।
आप ने एक मुर्दा क़ौम में ज़िन्दगी की रुह फूंक दी माअशरे को न सिर्फ एक मिसाली माअशरे में तब्दील कर दिया बल्कि उस माअशरे के लोगों को इन्सानियत का अलमबरदार बना दिया। आप सल ने उन में रुहानी और अखला़क़ी पाकीज़गी फरमाई कि ऐसी मिसाल इन्सानी तारीख में नहीं मिलती। हज़रत अनस बिन मालिक रज़ि फरमाते हैं कि मैंने 10 साल आप सल की ख़िदमत में गुज़ारे, मुझे आप सल ने कभी उफ तक नहीं कहा। सबसे ज़ियादा मुहासिने अख्लाक़ के मालिक थे।
तालीमात- तालीमात क़ुरआन और सुन्नत पर मबनी है। जो पूरी इन्सानियत के लिए हिदायत है। इन्सानों को अल्लाह की तौहीद से जोड़ना एक पुर अमन इंसाफ पसंद, और एक अखलाक़ी माअशरे की बुनियाद डालना। एक अल्लाह की इबादत और शिर्क से दूर रहना। नमाज़ रोज़ा ज़कात और हज की पाबंदी और उनकी हक़ीक़ी रुह को अपनाना।
आखिरत का तसव्वुर ज़िन्दगी के हर अमल को अल्लाह के सामने जवाबदेही के अहसास के साथ गुज़रना। गुफतगू में हमेशा सच बोलना, अमानतों में ख़यानत न करना, दुश्मनों को माफ करना और गुस्से पर क़ाबू रखना, मुश्किल में सब्र का दामन न छोड़ना, और अल्लाह की नअमतों पर अल्लाह का शुक्र अदा करना। वालिदैन के साथ हुस्ने सुलूक और उनकी फरमांबरदाी करना, समाज में औरतों को इज़्ज़त, अहतराम और उन को जायज़ अधिकार देना। कमज़ोर तबक़ों की मदद करना और उनके सिरों पर शफक़त का हाथ रखना, पड़ौसियों, रिश्तेदारों और आम इन्सानों के साथ नरमी और मुहब्बत से पेश आना। रंग, नस्ल, या क़बीले की बुनियाद पर कोई फर्क़ नहीं करना, फज़ीलत का मयार सिर्फ तक़वा है। अमीर, ग़रीब के लिए सिर्फ एक क़ानून नाफिज़ करना, नाप-तौल में कमी नहीं करना, सूद से बचना और हलाल रिज़्क़ हासिल करना। आप सल की तालीमात ने अरब के बद्दुओं को दुनिया का सबसे मुहज़्ज़ब इन्सान बना दिया। आप सल कम से कम अल्फाज़ मेे गहरी बात फरमाते, मिसालों से समझाते और अहम बात को तीन बार दुहराते ताकि सुनने वालों को बात अच्छी तरह से समझ आ जाए। आज के तमाम हालात को ऐसी तालीमात की बेहद ज़रुरत हो सकती है।
इंकलाब आप सल ने एक ऐसे माअशरे की बुनियाद रखी जहां रंग, नस्ल और ज़ात-.पात के ग़ुरुर को तोड़कर तक़वा को फज़ीलत की बुनियाद बताया और तमाम इंसानों को बराबर क़रार दिया। अरब को अज़मी पर और और गोरे को काले पर कोई दर्ज़ा नहीं दिया। रसूल ने सिर्फ 22 साल के अर्से में अरब की ज़मीन पर एक अज़ीम फिक्री और अमली इंकलाब बरपा कर दिया। जिसने पूरी इंसानी तारीख का रुख ही बदल दिया, लोगों की सोच और नज़रियात को बदल दिया, इंसान को एहसास दिला दिया कि जो कुछ करोगे, उसकी आखिरत में जवाबदेही आप ही की होगी। झूठ, फरेब, और लूटमार की जगह, दयानत, अमानत और भाईचारे को फरौग़ दिया जिससे एक बिखरी क़ौम एक बेहतरीन और मुत्तहिदा माअशरा बन बन गई। दुनिया का पहला तारीखी आईन (संविधान) बना कर रियासत-ए-मदीना की मिसाल पेश की। जिसमें एक मुनज़्ज़म, इन्साफ पसंद और पूर अमन इस्लामी रियासत की बुनियाद डाली। यह इंक़लाब जाहिरी तब्दिली नहीं थी बल्कि उस ने इंसानों के क़ुलूब (दिलों) और अज़हान (ज़हनों ) और सोचने के जावियों को ही बदल कर रख दिया।
मुसलमान यह दिन कैसे मनाते हैं?
घरों और शहरों की सजावट मुसलमान अपने घरों और मस्जिदों और बाज़ारों को खूबसूरत बरक़ी, कुमकुमों और हरी झंडियों से सजाते हैं ।
महफिल-ए-नाअत-ओ-दुरुद जगह-जगह क़ुरआन ख्वानी, नाअत ख्वानी सीरतुन्नबी के जलसे और दुरुद-ओ-सलाम की महफिलें मुनअकि़ की जाती हैं।
सदक़ा-ओ-ख़ैरात ग़रीबों और मुहताजों को खाना खिलाना, मिठाइयां बांटना और कपड़े तक़सीम किए जाते हैं ।
जुलूसे मीलाद मुहब्बत-ए-रसूल सल के इज़हार के लिए पुर-अमन जुलूस निकाले जाते हैं।
ईद मीलादुन्नबी का असल पैग़ाम
सिर्फ चराग़ां ही काफी नहीं यह दिन सिर्फ चरागां करने और खुशी मनाने ही का नाम नहीं है।
इत्तबा-ए-सुन्नत इस दिन का असल मक़सद अपनी सुन्नतों पर अमल करने का अहद करना है। हदीस- आप सल की इताअत को बराहे रास्त अल्लाह की इताअत क़रार दिया गया है। जिस ने मेरी इताअत की उसने अल्लाह की इताअत की और जिसने मेरी नाफरमानी की उसने अल्लाह की नाफरमानी की। यह सहीह हदीस-बुखारी और मुस्लिम में मौजूद है। रसूल सल के बताए हुए तरीक़ों को अपनाया और जिन चीजों से रुक जाने का हुक्म हो उस से रुक जाना मोमिन का फर्ज है। इत्तबा-ए-रसूल और इताअत-ए-रसूल इस्लाम का बुनियादी रुक्न हैं और ईमान की लाज़मी शर्त है। कामिल इमान उस वक़्त तक नहीं हो सकता जब तक इंसान की पसंद और नापसंद रसूल के लाए हुए दीन के मुताबिक़ ना हो
इस्लाहे माअशरा माअशरे में बुराइयां फैलने से अमन खत्म हो जाता है। मिलावट, झूठ और धोखाधड़ी, माअशरे को कमज़ोर कर देती है। तरक़्क़ी और कामयाबी के लिए सेहतमंद माहौल ज़रूरी है। हर शख्स पहले खुद को सुधारे। अपने इर्द-गिर्द फैली हुई बुराइयों पर नज़र रखें। कारोबार और लेनदेन में ईमानदार रहे हैं। औलाद को अच्छे अखलाक़ और दीनी क़द्रें सिखाएं। घर में एक दूसरे के हुक़ूक़ का खयाल रखें। सुख-दुख में एक-दूसरे का साथ दें। उलैमा और रहनुमाओं को चाहिए कि माअशरे की रहनुमाई के लिए अच्छे और बड़े दीनी इदारों से फायदा उठाएं।
खुलासा ईद मिलादुन्नबी मुसलमानों के लिए ईमान की ताज़गी वालिहाना मुहब्बत और बेपनाह खुशी का अज़ीमतर दिन है। इस दिन मुसलमान हुज़ूर सलल्लाहु अलैहि व सल्लम से अपनी अक़ीदत और मुहब्बत का इज़हार करते हैं। यह मुबारक दिन कायनात की सबसे अज़ीमतरीन हस्ती की आमद की याद दिलाता है। रबिउल अव्वल का चांद नज़र आते ही मुसलमानों के दिलों में इश्के रसूल की शमा और तेज़ हो जाती है जो क़ल्ब और रूह को एक नई ताज़गी बख्शती है। यह दिन हमें आप सल की सीरते तैयबा, अखलाक़े हसना और इंसानियत के लिए दी गई अज़ीम तालीमात पर अमल करने का अहद(वादा) ताज़ा करने का मौक़ा देता है। बारगाहे रिसालत से क़ल्बी ताल्लुक़ात गहरे होते हैं। अल्लाह ने क़ुरआन पाक में अपनी रहमत और फज़ल पर खुशी मनाने का हुक्म दिया है, और हुज़ूर की ज़ाते गरामी कायनात के लिए अल्लाह का सबसे बड़ा फज़ल और रहमत है। इस मौके पर वसीअ पैमाने पर लंगर का इंतज़ाम किया जाता है ताकि माअशरे का हर तबक़ा इस खुशी में शरीक हो सके।
दुआ-ओ-अहद हमें चाहिए कि नबी सल की तालीमात को दुनिया भर में फैलाएं। एक सच्चे मुसलमान की तरह जिं़दगी बिताएं। दुनिया और आखिरत में रसूलुल्लाह सल की शिफाअत नसीब हो। हमारे मुल्क में अमन-ओ-अमान क़ायम हो। हम अपनी जिंदगी का हर अमल नबी सल की सुन्नत के मुताबिक़ ढालें। हम हर-एक के साथ नरमी, सच्चाई और अमानतदारी का बर्ताव करेंगे। हम यतीमो, ग़रीबों और पड़ोसियों के हुक़ूक़ (अधिकारों) का खास खयाल रखेंगे। हम आपस के तफर्रक़ात को मिटा कर समाज में अमन और मुहब्बत को फरौग़ देंगे। हम झूठ, ग़ीबत और नफरत से बच कर इस्लाम का सच्चा पैगाम आम करेंगे।
कुंवर नियाज़ मुहम्मद एडवोकट व जर्नलिस्ट, बीकानेर, राजस्थान-9828215960
ईद मीलादुन्नबी के मौक़े पर ख़ुसूसी तब्सरा




