है लबों पर रात दिन जिन का तराना आप हैं
जान-ओ-दिल से हैं फिदा जिन पर ज़माना आप हैं
आपकी आमद हुई तो आ गई फस्ले बहार
गुलशने हस्ती जिन्होंने के निखारा आप है
नूर का पैकर, बशर की शक्ल में पैदा हुुआ
नूर दिल का और आंखों का उजाला आप हैं
नफरतें दिल से मिटीं तो भर गई है उल्फतें
ढंग जीने का जिन्होंने कि सिखाया आप हैं
चांद सूरज और तारों में ज़िया है आपकी
रोशनी ही रोशनी आक़ा सरापा आप हैं
कीजिए ’’रुहानी’’ पर चश्मे करम बहरे खुदा
मैं गदा हूं आपका और मेरे आक़ा आप हैं।
रहमान रुहानी , जयपुर




