लिख रहा हूं मैं अंजाम जिसका कल आग़ाज़ आएगा
मेरे लहू का हर एक क़तरा इंकलाब लाएगा
भारत में हर साल 15 अगस्त को अपना स्वतंत्रता दिवस यानी जरने आज़ादी बड़ी धुमधाम से मनाते आए है। स्वतंत्रता दिवस भारत में ही नहीं बल्कि जहां-जहाँ भारतवासी रहते है वहाँ-वहां 15 अगस्त को अपने संस्थानों व सरकारी कार्यालयों में तिरंगा ध्वज फहराया जाता है। भारत के अलावा जिस-जिस देश में अप्रवासी भारतीय निवास करते है वहाँ की लोकल संस्थाएं अपने स्तर पर बड़ी धूमधाम से 15 अगस्त स्वतंत्रता दिवस में किसी न किसी भारतीय सेलिब्रेटी को अतिथि के रूप में आमंत्रित करते हैं। स्वतंत्रता दिवस भारतीयों के लिए पवित्र त्यौहार है।
जैसा कि इतिहास से मालूम हुआ है कि भारत देश ब्रिटिश हुकुमतों की 200 साल की ग़ुलामी से स्वतंत्र हुआ था, तब ही से हम भारतीय इस दिन को सबसे महत्वपूर्ण राष्ट्रीय त्योहार मानते हैं । यह दिन भारत ज़ाति, धर्म से ऊपर उठकर पूरे मुल्क को एकता की डोर में बंधा हुआ नज़र आता है।
हम अच्छी तरह समझ लें कि हमारा भारत देश अंग्रेज़ों की ग़ुलामी से ऐसे ही आज़ाद नहीं हुआ है बल्कि इसका इतिहास बताता है कि इस आज़ादी के लिए सदियों संघर्ष करना पड़ा है और हमारे बेशुमार वीर जवानों को कुर्बानियां देनी पड़ी है।
हमारे देश भारत की आज़ादी का बिगुल अंग्रेज़ों के खिलाफ अगर माना जाए तो प्लासी की जंग से ही शुरू हो जाता है। जब अंग्रेजों ने बंगाल के नवाब सिराजुद्दौला को शिकस्त देकर बंगाल पर क़ब्ज़ा कर लिया था। उसके बाद जिसे हम पहली जंगे आज़ादी कहते हैं 1857 से आखिरी आज़ादी की कड़ी 15 अगस्त 1947 तक देश की आज़ादी का लम्बा सफर है।
इस आज़ादी के सफर में अनेकों जन आंदोलन, क्रांतियां और बालिदानों का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। प्रमुख स्वतंत्रता आंदोलनों में 10 मई 1857 जो कि एक सिपाही विद्रोह के रूप में मेरठ से शुरू हुआ। 1905 में स्वदेशी आंदोलन बंगाल के विभाजन के विरोध में विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार और स्वदेशी अपनाना, 1920 में महात्मा गांधी के नेतृत्व में ब्रिटिश सरकार का सहयोग न करने के लिए पहला असहयोग जन आंदोलन, 1930 में सविनय अवज्ञा आंदोलन, अहिंसक आंदोलन, दाण्डी मार्च, 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन। ’’करो या मरो’’ अंतिम आंदोलन था।
इन आंदोलनों में प्रमुख नेता और क्रांतिकारी जिन में महात्मा गांधी ने अहिंसा और सत्याग्रह के रास्ते से देश का नेतृत्व किया, जिसमें नेताजी सुभाष चन्द्र बोस, सरदार भगत सिह, राजगुरु, सुखदेव अश्फाक़ुल्लाह खां ने अपने-अपने बलिदान से देश भक्ति की अलख जगाई।
बाल गंगाधर तिलक, लाला राजपत राय, विपीन चंद्र पॉल ने उग्र राष्ट्रवादी की विचारधारा से आंदोलन को नई दिशा दी तथा शाह इस्माईल शहीद और सैयद अहमद शहीद बरेलवी ने आज़ादी की जद्दोजहद का आग़ाज़ किया। मुसलमानों में इस तहरीक के बड़े प्रभाव रहे।
1857 से 1947 तक देश को स्वतंत्रता दिलाने में किसी एक धर्म, समाज या जमाअत का जिक्र नहीं है बल्कि देश में रहने वाले सभी धार्मिक लोगों की अलग-अलग रुप से कुर्बानियां इतिहास में दर्ज हैं। जिन्हें हज़ारों इतिहासकारों ने इतिहास में लिखा है।
महान सेनानी, महान क्रांतिकारी और महापुरुषों में जिन को आज भारत के लोग याद कर रहे हैं उन में मुख्य तौर पर ये हैं-बंगाल में अरविंद घोष के छोटे भाई विरेन्द्र कुमार घोष और स्वामी विवेकानंद के भाई भूपेंद्र नाथ तशद्दुद का रास्ता अपनाया और धार्मिक किताबों का सहारा ले कर अंग्रेजों के खिलाफ जद्दो-जहद किया।
पंजाब में अमीर चंद, रास बिहारी दीनानाथ, अवध बिहारी, बसन्त कुमार विश्वास ने इंक़लाबी अंजुमन बनाई । इस अंजुमन के क़रीब इंक़लाबी साथियों को अंग्रेज सरकारों ने मौत की सज़ा सुनाई।
इसी तरह मौलाना महमूद हसन मदनी ने रेश्मी रुमाल नाम से तहरीक चलाई, जो हिन्दू और मुस्लिम दोनों के इतिहाद में चली।
इस तहरीक में खतो-किताबत में रेश्मी रुमाल प्रयोग में लाते थे। इसलिए इस तहरीक को रेश्मी रुमाल कहा आता है।
तहरीक के शेखुल हिन्द मौलाना महमूद हसन मदनी उन के साथी हुसैन अहमद मदनी, मौलाना अज़ीज़ गुल, मौलाना नुसरत हुसैन, मोलाना वहीद हसन को गिरफ्तार कर माल्टा भेज दिया।
मेडम भीकाजी कामा ने लंदन में हिन्दुस्तानी आज़ादी का झण्डा फहराया तथा फ्री इण्डिया सोसाइटी भी बनाई। लोकमान्य तिलक ने ’’केसरी’’ नामक समाचार पत्र निकाला तो अंग्रेजो ने इन का अखबार बंद करवा दिया और इनको 6 साल की सज़ा दी।
मौलाना अबुल कलाम आज़ाद ने ’’अल-हिलाल’’ अखबार शुरु किया, हसरत मोहानी ने ’’उर्दू मुअल्ला’’ नाम से अखबार निकाला।
अंग्रेजी सरकार ने बहुत से अखबार बंद करवा दिए और उनके मालिकों को जेलों में डाल दिया।
इसी तरह बरकतुल्लाह भोपाली ने ब्रितानिया के अंदर रह कर आज़ादी के लिए क़ौम परस्तों को जमा किया । उन्हे 1909 मे जापान के लिए जिला वतनी कर दिया।
इसी तरह भारत की आज़ादी में सोहन लाल भागना, लाला हरदयाल और काशीराम ने अमेरिका में ’’गदर पार्टी’’ बनाई और ’’गदर’’ के नाम से अखबार निकाला जिस से ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध अवाम को बेदार किया। इन्ही के साथ विनायक दामोदर वीर सावरकर ने ’’मित्र मण्डली’’ के नाम से संगठन बनाया फिर वे गिरफ्तार हो गए तथा अण्डमान में भेज दिया गया बाद में इन्हें रिहा कर दिया गया।
आज़ादी के परवानों की शक्ल में रामप्रसाद बिस्मिल, शहीद अश्फाक़ उल्लाह खां को अंग्रेजों ने फांसी की सज़ा दी। इसी तरह चंद्र शेखर आज़ाद एक पुलिस मुक़ाबले में शहीद हुए, सुखदेव और उधम सिंह को भी फांसी दी गई। क्रांतिकारी और देश के जांबाजों में नेताजी सुभाष चन्द्र बोस ने 1943 में आज़ाद हिन्द फौज बनाई, अण्डमान निकोबार द्वीपसमूह में आज़ाद हिन्द फौज की हुकुमत क़ायम की तथा जयहिन्द का नारा भी दिया। नेताजी सुभाष चन्द्र बोस बाहर जाने में कामियाब हो गए मगर उनके साथी जनरल शाहनवाज़ और कर्नल गुरुपाल सिंह ढिल्लों तथा मेजर सहगल पर मुकदमा चला, जिन की वकालत पंडित जवाहर लाल नेहरू और आसिफ अली ने की।
इसी तरह भारत की आज़ादी में यानी 1857 के इंक़लाब में शाह अब्दुल अज़ीज़ का अंग्रेज़ों के खिलाफ जिहाद का फतवा, इसी तरह मौलवी फज़्ले हक़ खेराबादी, मोलाना सरफराज के फतवे जिहाद के लिए खास रहे।
हाजी इम्दाहुल्लाह मक्की, मोलाना मुहमद क़ासिम नानोतवी, मौलाना रशीद अहमद गंगोही, हाफ़िज़ ज़ामिन शहीद ने शामली के मैदान में जिहाद किया।
बेगम हज़रत महल ने अपने बेटे ब्रजेश क़द्र को तख्त नशीन कर के लखनक का प्रबंध अपने हाथों में ले लिया फिर नेपाल में पनाह ली।मुफ्ती इनायतुल्लाह, मौलाना फज़्लेहक़ खैराबारी, मुफ्ती मज़हर करीम दरियाबादी, मोलाना याहया अली, मौलाना अहमदुल्लाह और मौलाना मुहम्मद जाफर थानेसरी, को कालेपानी की सज़ा मिली।
अंग्रेज़ों ने झझर, बल्लभगढ़, फर्रुखनगर के नवाबों को फांसी दी। मुफ्ती सदरुद्दीन खां आजर्दा और नवाब मुस्तफा खां शैफ्ता की जागीरें ज़ब्त कर ली गई। इमाम बख़्श सहबाई, मीर पंजाकश जैसे नामवर आलिमों को और फनकारों को कत्ल कर दिया।
अंग्रेज़ों की बदले की आग यहीं नहीं रुकी, यह आग दिल्ली के बाहर कानपुर, मेरठ, मुज़फ्फर नगर, मुरादाबाद, लखनऊ, गुड़गांव, मेवात तक कई हिस्सों तक फैल गयी जहां हजारों लोगों का क़त्ल हुआ।
अंग्रेज़ों ने न सिर्फ इन्सानों का क़त्ल किया बल्कि मज़हबी जगहों की भी बेहुरमती की गयी। दिल्ली में बहुत सी जगहों को गिरा दिया गया। शाही जामा मस्जिद को फौजी बैरक़, फतहपुरी मस्जिद को नीलाम कर के उसे गौदाम बना दिया, अकबराबादी मस्जिद को पार्क, ज़ीनतुल मस्जिद में फौजी रहने लगे, नवाब हामिद अली खां की मस्जिद में जानवर बांधे जाने लगे।
इसी तरह अंग्रेजो ने दिल्ली के बाहर पटना में उलमा सादिक पुर की जायदादें ज़ब्त कर ली गयीं । उनके महलों को गिरा कर खेत बना दिया।
मुरादाबाद और बिजनौर के खानवादों की जायदादें ज़ब्त की गयीं।
इस तरह आज़ादी की जंग 1857 की नाकामी ने समूचे भारत को झकझोर कर दिया। इस जंगे आज़ादी में कई मुस्लिम रहनुमाओं में बहादुर शाह जफर, बेगम हज़रत महल, हसरत माहोनी, मौलवी अहमदुल्लाह शाह, हकीम अजमल खां, डॉ .मुख्तार अंसारी, डॉ सैफुद्दीन किचलू, मुहम्मद अली ज़ौहर और मौलाना शौकत अली ज़ोहर, मौलाना उबैदुल्लाह सिंधी, मौलाना हुसैन अहमद मदनी, मौलाना फज़्लुल हसन, मुहम्मद बरकतुल्लाह, मुफ्ती किफायतुल्लाह, डॉ राजेन्द्र प्रसाद ,पंडित जवाहरलाल नेहरू, मोतीलाल नेहरू, लाल बहादुर शास्त्री,
गोखले, दादा भाई नोरोजी,
नाना साहब, रानी लक्ष्मीबाई बाई, कस्तूरबा गांधी, अरुणा आसिफ अली, रईसुल अहरार मौलाना हबीबुर्रहमान लुधियानवी, जैसे महान नेताओं और क्रांतिकारियों ने बिना किसी ज़ाति व मज़हब की परवाह करते हुए अपने भारत देश के लिए अलग-अलग तरीके़ से कुर्बानियां दी और हंसते .हंसते फांसी के फंदों को गले लगाया।
आज़ादी का जश्न लाल क़िले का प्रमुख आयोजन है, इस दिन भारत के प्रधानमंत्री नयी दिल्ली के ऐतिहासिक लाल क़िले पर राष्ट्रीय तिरंगा फहराते हैं। भारत देश के वासियों को संबोधित करते हैं।
इस दिन स्कूलों, कॉलेजों, और सरकारी कार्यालयों पर तिरंगा फहराया जाता है। कई राज्यों में इस दिन आसमान रंग-बिरेगी पंतगों से सपट जाता है। समारोह के अंत में मिठाईयां बांटी जाती है। इस दिन हम सभी भारत वासियों की अहम ज़िम्मेदारी बनती है कि देश की तरक़्क़ी में आगे बढ़ते रहें।
15 अगस्त 1947 में देश आज़ाद होने के बाद भारत ने विज्ञान, तकनीक, खेल और अर्थ व्यवस्था के क्षेत्रों में वैश्विक स्तर पर प्रगति की है, इस वजह से पूरा विश्व हमारी तरफ देख रहा है।
भारत की आबादी आज 140 करोड़ के क़रीब है । हमें चाहिए कि स्वतंत्रता दिवस के दिन सिर्फ छुट्टी ही न मनाएं और न यह छुट्टी मनाने का दिन है बल्कि हमारी ज़िम्मेदारी है कि भारत देश से भ्रष्टाचार, ग़रीबी बेरोजगारी, गंदगी जैसी बुराईयों को खत्म करने का संकल्प लें। इसी आज़ादी के बाद देश के संविधान ने हमें जो-जो अधिकार दिए हैं, उन के अनुसार चलते हुए आपसी भाईचारा, बढ़ाना चाहिए, यह दिन आत्म मंथन करने का दिन है तथा देश के वीरों और जांनिसारों ने अपनी जानें कुर्बान की हैं, इसलिए कि हम भारतीय संविधान के अनुसार जीवन बिताएं। यह दिन देश के अमर शहीदों को नमन करने का पवित्र अवसर है।
आखरी संदेशः. हम सभी को एकजुट होकर भारत को मज़बूत, समृद्ध और आत्म निर्भर रास्ट्र मनाने का प्रयत्न करना चाहिए। यही देश के महान क्रांतिकारों और शहीदों को सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
’’यह नफरत बूरी है ना पालो इसे,
दिलों में ख़लिश है निकालो इसे,
ना तेरा ना मेरा ना इसका ना उसका,
यह सब का वतन है बचा लो इसे।
कुंवर नियाज़ मुहम्मद, एडवोकेट व पत्रकार, बीकानेर-982 821 5960




